इज़राइल का इतिहास: भूमि, लोग और सभ्यताएँ
कनान और इज़राइल-यहूदा के राज्यों से उस्मानी शासन और ब्रिटिश मैंडेट तक।

Credit: American Colony Jerusalem photographic department; photographer not individually identified. Public domain. Archive record and image details.
एक भूमि, अनेक इतिहास
इज़राइल की भूमि का इतिहास 1948 में आधुनिक राज्य की स्थापना से बहुत पहले शुरू होता है। भूमध्यसागरीय तट, पहाड़ियों और यरदन घाटी के रास्ते मिस्र को सीरिया और मेसोपोटामिया से जोड़ते थे। व्यापार और सांस्कृतिक संपर्क के साथ विजय और सत्ता-संघर्ष भी हुए। कनान, इज़राइल, यहूदा, यहूदिया और फ़िलिस्तीन जैसे नाम अलग युगों और संदर्भों के हैं; वे हजारों वर्षों तक अपरिवर्तित सीमाओं का संकेत नहीं देते। यहूदी समुदायों का इतिहास अन्य निवासियों के साथ पढ़ना चाहिए।
कनान और शुरुआती इस्राएली समुदाय
उत्तर कांस्य युग में कनान कई नगर-राज्यों का क्षेत्र था, जिन पर मिस्र का गहरा प्रभाव था। पुरातत्त्वविद बस्तियों, मिट्टी के बर्तनों और अभिलेखों से पहाड़ी इलाकों में इस्राएली समुदायों के विकास को समझते हैं। हिब्रू बाइबल पूर्वजों, मिस्र से निर्गमन और राजतंत्र की कथाएँ सुरक्षित रखती है। उनका धार्मिक महत्त्व हर घटना की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि नहीं है। प्रारंभिक संयुक्त राज्य के आकार पर विशेष बहस है। लिखित और भौतिक साक्ष्यों को उनके उद्देश्य और सीमाओं सहित देखना आवश्यक है।
दो राज्य और निर्वासन
लौह युग में उत्तर का इज़राइल और दक्षिण का यहूदा अलग राजनीतिक इकाइयाँ थे, जिनके केंद्र सामरिया और यरूशलम थे। अश्शूर ने ईसा पूर्व आठवीं शताब्दी के अंत में उत्तरी राज्य को जीत लिया। बाबिल ने 586 ईसा पूर्व यरूशलम और प्रथम मंदिर को नष्ट किया तथा आबादी के एक भाग को निर्वासित किया। सभी निवासी नहीं गए। फ़ारसी शासन में कुछ निर्वासित लौट सके। पुनर्निर्माण और निर्वासन की स्मृति ने यहूदी जीवन तथा हानि, वाचा और वापसी की धारणाओं को गहराई से प्रभावित किया।
द्वितीय मंदिर का संसार
फ़ारसी, हेलेनिस्टिक और रोमी शासन ने क्षेत्र की संस्थाओं और संस्कृति को बदला। यूनानी संस्कृति से संपर्क ने आदान-प्रदान और संघर्ष दोनों पैदा किए। मकाबी विद्रोह और हसमोनी राजवंश के बाद कुछ समय यहूदी शासन रहा। फिर ईसा पूर्व पहली शताब्दी में रोम का प्रभुत्व स्थापित हुआ। हेरोद ने विशाल निर्माण करवाए, लेकिन रोम पर निर्भर रहा। उस समय यहूदी धर्म में अनेक मत थे जो अधिकार और धार्मिक अभ्यास पर बहस करते थे। ईसाई धर्म भी इसी यहूदी परिवेश में उत्पन्न हुआ।
रोम के युद्ध और बीजान्टिन काल
रोम के विरुद्ध विद्रोह का अंत 70 ईस्वी में द्वितीय मंदिर के विनाश से हुआ। 132–135 का बार कोखबा विद्रोह और विनाश तथा विस्थापन लाया। फिर भी यह कहना गलत है कि सभी यहूदियों को एक ही समय निकाल दिया गया। स्थानीय समुदाय बने रहे और प्रवासी समुदाय भी विकसित हुए। बीजान्टिन साम्राज्य के ईसाई बनने से धार्मिक सत्ता-संबंध बदले। चर्च और तीर्थयात्राएँ अधिक महत्त्वपूर्ण हुईं। बदलती पाबंदियों और कानूनी असमानता के बावजूद यहूदी समुदायों ने संस्थाएँ, अध्ययन और सांस्कृतिक जीवन बनाए रखा।
मध्यकालीन परिवर्तन
सातवीं शताब्दी की मुस्लिम विजय ने नया राजनीतिक क्रम स्थापित किया। यरूशलम को यहूदी और ईसाई परंपराओं के साथ इस्लाम में भी स्थायी महत्त्व मिला। अरबी भाषा फैली, जबकि अलग धार्मिक समुदाय बने रहे। धर्मयुद्ध, मुस्लिम पुनर्विजय और ममलूक शासन ने आगे परिवर्तन किए। इन सदियों को लगातार सद्भाव या निरंतर शत्रुता का युग कहना उचित नहीं है। स्थितियाँ स्थान, शासक और समय के अनुसार बदलती थीं। मध्यकालीन पहचान और प्रशासन को आज के राष्ट्र-राज्यों और सीमाओं पर सीधे नहीं रखा जा सकता।
उस्मानी सदियाँ
1516–1517 में क्षेत्र उस्मानी साम्राज्य में शामिल हुआ। लगभग चार सदियों तक खेती, व्यापार, धार्मिक संस्थाओं और स्थानीय प्रशासन ने दैनिक जीवन को आकार दिया। यरूशलम, सफ़ेद, तिबेरियास और हेब्रोन यहूदी संबंध और बसावट के महत्त्वपूर्ण केंद्र थे; मुस्लिम और ईसाई समुदाय भी स्थानीय समाज का हिस्सा थे। इबेरिया से निकाले गए सेफ़ारदी यहूदियों ने उस्मानी दुनिया के व्यापार और विद्या के नेटवर्क बदले। उत्तर अफ्रीका, बाल्कन और पूर्वी भूमध्यसागर के संबंध दिखाते हैं कि स्थानीय इतिहास आज की सीमाओं से बहुत व्यापक था।
राष्ट्रवाद और ब्रिटिश मैंडेट
उन्नीसवीं शताब्दी में प्रवास, यातायात और राष्ट्रवाद ने क्षेत्र को बदला। ज़ायनवाद ने यहूदी आत्मनिर्णय का लक्ष्य रखा और अरब समाज में भी स्वतंत्रता की माँग विकसित हुई। प्रथम विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन ने मैंडेट व्यवस्था में शासन किया। आप्रवास, भूमि और राजनीतिक प्रतिनिधित्व विवाद के प्रमुख विषय बने। संयुक्त राष्ट्र की 1947 की विभाजन योजना शांतिपूर्ण संक्रमण नहीं ला सकी। गृहयुद्ध और 1948 के युद्ध ने नया अध्याय खोला। पिछला इतिहास गहरे संबंध समझाता है, लेकिन आधुनिक संघर्ष को प्राचीन काल का अपरिहार्य परिणाम नहीं बनाता।